Followers

Thursday, October 25, 2012

"पुस्तक समीक्षा-“खामोश खामोशी और हम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

"खामोश खामोशी और हम"
    दो माह पूर्व मैं बड़े पुत्र से मिलने के लिए देहरादून गया तो चाचा-भतीजी के आभासी रिश्तों से जुड़ी डॉ.(श्रीमती) नूतन गैरोला से भी मिलने के लिए उनके निवास पर चला गया। ब्लॉगिस्तान की बहुत सी बातें उनसे साझा करने के बाद जब मैं चलने लगा तो भतीजी ने मुझे “खामोश खामोशी और हम” काव्य संग्रह की एक प्रति मुझे भेंटस्वरूप दी!
    आज इसकी समीक्षा में कुछ लिखने का मन हुआ है और “खामोश खामोशी और हम” के बारे में कुछ शब्द लिखने का प्रयास कर रहा हूँ! लेकिन अट्ठारह रचनाधर्मियों की कृति पर अपनी कलम चलाना भी एक दुष्कर काम है। देखिए कितना सफल होता हूँ इसमें। क्योंकि सभी की लेखनी की बानगी भी दिखाना है मुझको।
    “खामोश खामोशी और हम” काव्य संग्रह को ज्योतिपर्व प्रकाशन, गाजियाबाद (उ.प्र.) द्वारा प्रकाशित किया गया है। जिसका सम्पादन हिन्दी ब्लॉगिस्तान की जानी-मानी ब्लॉगर और साहित्यविदूषी रश्मि प्रभा ने किया है। बढ़िया जिल्दसाजी वाले इस संकलन में 268 पृष्ठ हैं और 18 रचनाधर्मियों की रचनाओं को इस संग्रह में समाहित किया गया है, जिसका मूल्य 299/- रुपये मात्र है। इस संकलन में प्रत्येक रचनाधर्मी की छः-छः रचनाओं को संकलित किया गया है।
   संकलन के प्रारम्भ में अपनी कल़म से रश्मि प्रभा जी ने कविता के माध्यम से अपनी बात कहने का प्रयास किया है-
“....................
अनकहे दर्द को
अनकहे आँसू
बस विश्वास का सुकून देते हैं
वरना खामोशी
खामोशी संग नहीं बैठती...
.....................
खामोशी से खामोशी का रिश्ता
अटूट होता है
अपना होता है!”
   सबसे पहले  “खामोश खामोशी और हम” में 27 वर्षीय युवा कवि शेखर सुमन को स्थान दिया गया है। कौमी एकता और भाई-चारे के प्रबल समर्थक इस नवोदित साहित्यकार की रचनाओं के शीर्षक हैं “हाँ मैं मुसलमान हूँ, वो लम्हें जी शायद याद न हों, माँ, तुम कहाँ हो, थके हुए बादल और नयी दुनिया” को इस संकलन में प्रकाशित किया गया है। ये सभी रचनाएँ पाठकों के मन पर अपना असर छोड़ती हैं। “थके हुए बादल” कैसे होते हैं? देखिए इस रचना की कुछ पंक्तियाँ-
“कुछ थके हारे बादल मैं भी लाया हूँ
यूँ ही चलते-चलते हथेली पर गिर गये थे
उन्हें
यादों का बिछौना सजाकर दे दिया है
थोड़ा आराम कर लेंगे....”
    इसके बाद श्रीमती अनीता निहलानी जी की रचनाएँ “बीज से फूल तक, जागा कोई कौन सो गया, कब होगा जागरण, छूट गई जब मैं.स्वप्न और जागरण, यह अमृत का इक सागर है” इस संकलन में हैं। जिनमें नैसर्गित प्यार-स्नेह और जनजागरण को बहुत कुशलता से विदूषी कवयित्री ने अपने शब्दों को पिरोया है। उदाहरणस्वरूप उनकी इस रचना का कुछ अंश देखिए-
“बूढ़ी परी ने शाप दिया था उस दिन
सो गया सारा देश
राजभवन के चारों ओर उग आये बड़े-बड़े जंगल
थम गया था जीवन...”
    इसके बाद कवयित्री कविता विकास की रचनाएँ “बदलाव, कुछ नज़्म मेरे, साम्य, आँखों में बसता है, आशा-किरण और उड़ने की इच्छा” कविताओं को इसमें स्थान दिया गया है। कविता विकास के बारे में यहाँ यह भी उल्लेख करना चाहता हूँ कि इनकी एक काव्यकृति “लक्ष्य” हाल में ही प्रकाशित हुई है। देखिए कविता विकास की कविता की कुछ पंक्तियाँ-
“दरख्तों के साये में
अब सुकून नहीं होती
परिंदों की उड़ान में
कृत्रिम संगीत को ढोती
गाँवों की पगडण्डिया
सड़कों में तब्दील हो गयीं
चबूतरों की पंचायत
गुजरे ज़माने की बात हो गयी...”
    रायपुर (छत्तीसगढ़) के किशोर कुमार खोरेन्द्र भारतीय स्टेट बैंक से अवकाशप्राप्त हैं। उन्होंने अपने परिचय के बारे में “परिचय.. अपना परिचय क्या दूँ...?” में उन्होंने लिखा है-
“...खुद की परछाई को पाता हूँ
कभी साथ अपने
कभी लगता है तन और मन से
परे.. अस्तित्व मेरा...
मन के एकान्त में करता है विचरण”
    इस संकलन में इनकी अन्य रचनाएँ भी बहुत सुन्दर और पठनीय हैं!
     बिहार के छोटे से जिले नवादा के निवासी और ग़ज़ल की चौपाल ब्लॉग के स्वामी धीरेन्द्र कुमार की बढ़िया ग़ज़लें इस संकलन में समाहित हैं।
    इनकी “नूर-ए-इश्क” ग़ज़ल का अंश देखिए-
“चाँदनी गर तेरा नूर है, तो इश्क मेरा नूर है,
चाँदनी गर ज़िन्दगी तेरी, तो इश्क मेरा गुरूर है।“
    उत्तराखण्ड, देहरादून में दून अस्पताल में महिलारोग विशेषज्ञा के रूप में कार्यरत डॉ. नूतन डिमरी गैरोला बहुत अधिक व्यस्तता के बावजूद भी लेखन कार्य कर ही लेती हैं। उनकी सभी रचनाएँ जनमानस से सीधे जुड़ी ही हैं।
  देखिए उनकी “खुद से खुद की बातें” रचना-
“मेरे जिस्म में प्रेतों का डेरा है
कभी ईर्श्या उफनती
कभी लोभ-क्षोभ
कभी मद मोह
लहरों से उठते
और फिर गिर जाते।
पर मैं न हारी हूँ कभी,
सर्वथा जीत रही मेरी,
क्योमक रौशन दीया
रहा संग मन में मेरे
मेरी रूह में
ईश्वर का बसेरा है।“
     यशवन्त राजबली माथुर 6 वर्ष की आयु से लिख रहे हैं। इनका ब्लॉग भी है जो “जो मेरा मन कहे” के नाम से काफी लोकप्रिय है। ये जिला बाराबंकी के दरियाबाद के निवासी हैंऔर यशवन्त माथुर के नाम से प्रसिद्ध हैं। देखिए इनकी एक रचना “मोड़” की बानगी-
“कल जहाँ था
आज फिर
आ खड़ा हूँ
उसी मोड़ पर
जिससे होकर
कभी गुज़रा था
भूल जाने की
तमन्ना लेकर”
    अपने पति के साथ सम्प्रति देहरादून में रह रही राजेश कुमारी जी एक अच्छी माँ, अच्छी पत्नी होने के साथ-साथ एक अच्छी कवयित्री भी हैं। अभी हाल में ही इनकी एक काव्यकृति प्रकाशित हो चुकी है। माता-पिता को समर्पित इनकी एक रचना “देखो शिखर सम खड़ा हुआ” की बानगी देखिए-
“देखो शिखर सम खड़ा हुआ
सकुचाया सा डरा-डरा
अनचाहा सा मरा-मरा
कम्पित काया भीरु मन
जाने कब हो जाए हनन
सघन तरु की छाया में
इक नन्हा पौधा खड़ा हुआ।“
    हिन्दी दिवस को हाथरस में जन्मी हिन्दी सुता वीना श्रीवास्तव की भी रचनाएँ इस कंकलन में समाहित हैं, इनका ब्लॉग “वीणा के सुर” हिन्दी ब्लॉगिस्तान में बहुत ही चहेता ब्लॉग है।
   देखिए इनकी एक रचना ”तुम नहीं आये” का कुछ अंश-
“सब कुछ आता है
तुम नहीं आते
ये दिन ये रातें
आती जाती हैं
एक के बाद एक”
    शन्नो अग्रवाल अपने परिचय में लिखती हैं-
“...कभी फुरसत या तनहाई के लम्हों में शब्दों से खेल लेती हूँ और लेखनी की पिपासा कुछ शान्त हो जाती है।“
इनकी रचना “दीप जलें” का कुछ अंश देखिए-
"आओ मिलकर दीप उठाकर
साथ चलें
घर-बाहर रौशन कर दें सारा
दीप जलें.."
     अर्थशास्त्र और हिन्दी विषय से स्नातकोत्तर शिखा कौशिक ने अपनी शोध यात्रा भी पूरी कर ली है। अतः इन्हें डॉ.शिखा कौशिक लिखना ही ज्यादा उचित होगा। इनको ब्लॉग में अभी कुछ ही समय हुआ है मगर फिर भी योग्यता के कारण इनकी गणना हिन्दी के ब्लॉग लिखने वाले साहित्यकारों में होती है।
देखिए इनकी रचना “सड़क” का कुछ अंश-
"मैं सड़क हूँ, मैं गवाह हूँ
आपके ग़म और खुशी की
है नहीं कोई सगा पर
मैं सगी हूँ हर किसी की”
   चवालीस बसन्त देख चुकी अनुलता भोपाल म.प्र. की हैं। इस संकलन में प्रकाशित इनकी एक रचना “महामुक्ति” का यह अंश देखिए-
"हे प्रभू
मुक्त करो मुझे
मेरे अहंकार से
दे दो कष्ट अनेक
जिससे बह जाए
अहम् मेरा
अश्रुओं की धार में”
    अनन्त की ग़ज़लें और अनन्त का दर्द ब्लॉगों के स्वामी अनुराग अनन्त की भी रचनाएँ इस संकलन में हैं।
    देखिए इनकी रचना “मैंने कलम उठाई है” का कुछ अंश-
“मेरी कब्र खोदने के लिए ही
मैंने कलम उठाई है
कुदाली की तरह खोदेगी
ये मेरी कब्र
जींटीयों के कंधे पर चढ़कर
मैं पहुँचूँगा उस जगह
जहाँ मैं आजाद हो जाऊँगा।“
    कविता और व्यंग्य लेखन के सशक्त हस्ताक्षर मुकेश तिवारी की भी कुछ रचनाओं को खामोश खमोशी और हम में स्थान मिला है। देखिए इनकी रचना “माँ, केवल माँ भर नहीं होती का” एक अंश-
“माँ किसी भी उम्र में
केवल माँ भर नहीं होती
जबकि वो 
खुद को भी नहीं संभाल रही होती हो
तब भी विश्वसक होती है
आसरा होती है”
    वाराणसी की डॉ.माधुरी लता पाण्डेय की भी कुछ रचनाएँ इस संकलन में समाहित है-
    ये अपने परिचय में कहती हैं-
“मुझसे मत पूछो मेरा गाँव
सृष्टिविधा का अंग बनी हूँ
पावन सरिता बहता जीवन
इक तरुवर पर पाया ठाँव”
    ज़िन्दगी की राहें ब्लॉग के स्वामी मुकेश कुमार सिन्हा की भी कुछ रचनाएँ इस संकलन में हैं। देखिए इनकी लेखनी की बानगी का कुछ अंश “आभासी मैं”-
“चेहरे पर ब्रश से फैलाता
शैविंग क्रीम
तेजी से चलता हाथ
ऑफिस जाने की जल्दी
सामने आइने में
दिखता अक्स...
ओह!
आज अनायास्
टकरा गई नज़रें
दिखे..दो चेहरे
शुरू हो गई
आपस में बात
एक तो मैं ही था
और..!
एक आभासी मैं”
     इस संकलन में स्थान प्राप्त रजनीश तिवारी का ब्लॉग है-“रजनीश का ब्लॉग” देखिए इनकी रचना “एक बून्द” का कुछ अंश-
“ओस की इक बूंद
जम कर घास पर
मोती हो गई”
    रीता प्रसाद उर्फ ऋता शेखर “मधु” को हाइकू, हाइगा, तांका, चोका, कविता और आलेख आदि कई विधाओं में महारत हासिल है। इनको भी इस संकलन में स्थान मिला है।
    देखिए इनकी एक रचना “गीता प्राकट्य” का यह अंश-
“बाल-वृद्ध, नर-नारी जाने
कथाओं का संग्रह है भारत
उन कथाओं में महा कथा है
नाम है जिसका महाभारत”
     “खामोश खामोशी और हम” संकलन को सांगोपांग पढ़कर मैंने अनुभव किया है कि श्रीमती रश् प्रभा जी ने इसमें भाषिक सौन्दर्य के अतिरिक्त साहित्य की सभी विशेषताओं का संग-साथ लेकर जो निर्वहन किया है वह अत्यन्त सराहनीय है।
   मुझे पूरा विश्वास है कि “खामोश खामोशी और हम” पाठक से अवश्य लाभान्वित होंगे और प्रस्तुत कृति समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगी।
 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार 
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail .  roopchandrashastri@gmail.com
फोन-09808136060

Friday, October 5, 2012

"बात अन्धश्रद्धा की नहीं है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बात अन्धश्रद्धा की नहीं है!

   मेरे पूज्य दादा-दादी जी का श्राद्ध पितृपक्ष की षष्टी को पड़ता है। गत वर्ष मैं पंचमी की शाम को देहरी लीप कर उन्हें आमन्त्रित करना भूल गया था। अगले दिन षष्टी थी। विधि-विधान से हमने श्राद्ध किया और उनके हिस्से का भाग दो पत्तलों में रखकर छत की मुंडेर पर रख दिया मगर शाम तक वो भोजन ज्यों का त्यों रखा रहा। एक भी कौआ उन्हें खाने के लिए नहीं आया। मन में पछतावा भी बहुत रहा। 
    लेकिन इस वर्ष हमने वो भूल नहीं की। पंचमी की शाम को देहरी लीप कर पितरों को आमन्त्रित किया कि कल आपका श्राद्ध है। आप अपने हिस्से का भोजन ग्रहण करने अवश्य आयें।
आज षष्टी के दिन हमने विधि-विधान से अपने पूज्य दादा-दादी जी का श्राद्ध किया।
   जैसे ही उनके हिस्से का भोजन पत्तलों में छत की मुंडेर पर रखा, उसको खाने के लिए कागा आ गये।
    कुछ मेरे आर्यसमाजी मित्र इस बात का उपहास भी करते होंगे। मगर मुझे इस बात की परवाह नहीं है। हम लोग जब हवन करते हैं तो प्रचण्ड अग्नि में यज्ञकुंड में घी-हवनसामग्री और पौष्टिक पदार्थ डालते हैं। जिसका सहस्त्रगुना होकर वह पदार्थ पूरे वातावरण में अपनी गन्ध से सारे लोगों को मिल जाता है। आज भी तो हमने वही किया है। हवनकुण्ड में प्रज्वलित अग्नि में भोजन घी और हवनसामग्री की आहुति दी है। जो अन्तरिक्ष में जाकर सभी लोगों को प्राप्त भी हुई है।
    आर्यसमाज ईश्वर, जीव और प्रकृति को अजर और अमर मानता है। फिर जीवात्मा के अस्तित्व को कैसे नकारा जा सकता है। श्राद्ध का अर्थ होता है श्रद्धापूर्वक जीवित के साथ ब्रह्माण्ड में विचरण कर रही जीवात्माओं को भोजन कराना। हमने भी पूरी आस्था और श्रद्धा से वही कार्य आज भी किया है।
   इसके बाद अपने वृद्ध माता-पिता जी को पूरी श्रद्धा से भोजन कराया ताथा उसके बाद खुद भी इस भोजन को खाया है।

Sunday, July 29, 2012

“नन्हे सुमन” की भूमिका (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज 29 जुलाई को
उड़नतश्तरी वाले समीर लाल जी का जन्म दिन है।
इस अवसर पर मैं उनको
हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाइयाँ प्रेषित करता हूँ!
लगभग 2 वर्ष पूर्व उन्होंने मेरी बालकृति
“नन्हे सुमन” की भूमिका लिखी थी!
एक अद्भुत संसार - ’नन्हें सुमन’
            आज की इस भागती दौड़ती दुनिया में जब हर व्यक्ति अपने आप में मशगूल है। वह स्पर्धा के इस दौर में मात्र वही करना चाहता है जो उसे मुख्य धारा में आगे ले जाये, ऐसे वक्त में दुनिया भर के बच्चों के लिए मुख्य धारा से इतर कुछ स्रजन करना श्री रुपचन्द्र शास्त्री ’मयंक’ जैसे सहृदय कवियों को एक अलग पहचान देता है।
          ‘मयंक’ जी ने बच्चों के लिए रचित बाल रचनाओं के माध्यम से न सिर्फ उनके ज्ञानवर्धन एवं मनोरंजन का बीड़ा उठाया है बल्कि उन्हें एक बेहतर एवं सफल जीवन के रहस्य और संदेश देकर एक जागरूक नागरिक बनाने का भी बखूबी प्रयास किया है।
          पुस्तक ‘नन्हें सुमन’ अपने शीर्षक में ही सब कुछ कह जाती है कि यह नन्हें-मुन्नों के लिए रचित काव्य है। परन्तु जब इसकी रचनायें पढ़ी तो मैंने स्वयं भी उनका भरपूर आनन्द उठाया। बच्चों के लिए लिखी कविता के माध्यम से उन्होंने बड़ों को भी सीख दी है!
‘डस्टर’ बहुत कष्ट देता है’’ कविता का यह अंश बच्चों की कोमल पीड़ा को स्पष्ट परिलक्षित करता है-

‘‘कोई तो उनसे यह पूछे,
क्या डस्टर का काम यही है?
कोमल हाथों पर चटकाना,
क्या इसका अपमान नही है?’’

‘नन्हें सुमन’ में छपी हर रचना अपने आप में सम्पूर्ण है और उनसे गुजरना एक सुखद अनुभव है। उनमें एक जागरूकता है, ज्ञान है, संदेश है और साथ ही साथ एक अनुभवी कवि की सकारात्मक सोच है।
          आराध्य माँ वीणापाणि की आराधना करते हुए कवि लिखता है-

‘‘तार वीणा के सुनाओ कर रहे हम कामना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।
इस धरा पर ज्ञान की गंगा बहाओ,
तम मिटाकर सत्य के पथ को दिखाओ,
लक्ष्य में बाधक बना अज्ञान का जंगल घना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।’’

          मेरे दृष्टिकोण से तो यह एक संपूर्ण पुस्तक है जो बाल साहित्य के क्षेत्र में एक नया प्रतिमान स्थापित करेगी। मुझे लगता है कि इसे न सिर्फ बच्चों को बल्कि बड़ों को भी पढ़ना चाहिये।
          मेरा दावा है कि आप एक अद्भुत संसार सिमटा पायेंगे ’नन्हें सुमन’ में, बच्चों के लिए और उनके पालकों के लिए भी!
          कवि ‘‘मयंक’’ को इस श्रेष्ठ कार्य के लिए मेरा साधुवाद, नमन एवं शुभकामनाएँ!

-समीर लाल ’समीर’
http://udantashtari.blogspot.com/
36, Greenhalf Drive
Ajax, ON
Canada



Saturday, November 5, 2011

" भगवान के घर देर है, अन्धेर नहीं!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


DD Mishra, DIG, Fire Services, speaks to journalists about corruption in the purchase of equipment and other material. (PTI Photo by Nand Kumar) UP: cop versus cops

डी.आई.जी. - डी.डी.मिश्र
    भ्रष्टाचार के मुद्दे पर डी.आई.जी. - डी.डी.मिश्र ने अपनी जबान खोली तो सत्ताधीशों ने उनकी मानसिक स्थिति खराब बताकर उन्हें जबरन मानसिक चिकित्सालय में भर्ती करवा दिया।
यह तो पता नहीं कि मानसिकता किसकी खराब है मगर यह जरूर सिद्ध हो गया है कि भ्रष्टाचार पर अपनी साफगोई दिखानेवालों की दुनिया के सबसे बड़े प्रजातन्त्र में खैर नहीं है।
    अन्ना हजारे ने और स्वामी रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलन्द की तो शासन के मठाधीशों को यह सहन नहीं हुआ और स्वामी रामदेव के आन्दोलन को कुचल दिया। अन्ना को भी इसका खमियाजा भुगतना पड़ा और उन्हें अकारण जेल में भेज दिया मगर आरोपों में कोई दम नहीं होने के कारण उन्हे न केवल रिहा किया गया बल्कि अनशन करने की भी इजाजत दे दी गई। 
    इसके बाद हरियाणा में उपचुनाव हुए और जनता ने सच्चाई का साथ देते हुए सत्ताधारी दल के प्रत्याशी को धूल चटा दी!
इसके बाद उ.प्र. के एक डी.आई.जी. - डी.डी.मिश्र ने जब मुँह खोला तो उन्हें भी शासन के दमन का शिकार होना पड़ा!
    इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि इस देश में अन्ना हजारे जैसे देशभक्तों का साथ देने पर सरकार के कोप का सामना सबी को करना पड़ेगा! यानि सत्ताधीश इस देश में कभी भी भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं करना चाहते हैं।
   अब देखना यह है कि भ्रष्टाचारी लोग आगामी चुनाव में जनता का विश्वास कैसे जीत पायेंगे?       
     भगवान के घर देर है, अन्धेर नहीं! 
आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी?

Monday, October 17, 2011

"दिन का प्रारम्भ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

दिन का प्रारम्भ सूर्योदय से न होकर रात्रि 12 बजे से क्यों होता है?
इसका उत्तर मेरे विचार से यह है कि-
सूर्योदय का कोई सार्वभौमिक समय निश्चित नहीं है।
हमारे देश में कभी सूर्योदय पाँच बजे, कभी 6 बजे और कभी 7 बजे भी होता है। इसके अतिरिक्त दुनिया के सभी देशों में सूर्योदय का समय अलग-अलग होता है। इसलिए अगले दिन की गणना सूर्योदय से करना सम्भव नहीं है। लेकिन सारी दुनिया में मध्यरात्रि का समय 12 बजे निश्चित है। अतः दिन का आरम्भ मध्यरात्रि 12 बजे के बाद से ही माना जाता है।

Friday, September 16, 2011

"रूप इतना खूबसूरत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

रूप इतना खूबसूरत
आइने की क्या जरूरत

आ रहीं नज़दीक घड़ियाँ
जब बनेगा शुभमुहूरत

बैठकर जब बात होंगी
दूर होंगी सब कुदूरत


लाख पर्दों में छुपाओ
छिप नहीं पायेगी सूरत

दिल में हमने है समायी
आपकी सुन्दर सी सूरत

आज मेरे चाँद का है
"रूप" कितना खूबसूरत

Wednesday, August 17, 2011

Anna Hajare is Anna Karore now

कल 16 अगस्त 2011 को अन्ना हजारे द्वारा जे पी पार्क में जो धरना व अनशन करना प्रस्तावित था। उससे पूर्व ही उन्हें गिरफ्तार करके दिल्ली पुलिस ने सत्ता के साथ अपने रिश्तो की मजबूती दर्शाई । फिर दिन भर आरोप प्रत्यारोप लगते रहे और अन्ना के पक्ष मंे बढते जनाधार व सत्ता के प्रति बढते जनाक्रोश के चलते सरकार ने आखिर में उनकी रिहाई का मन बना लिया। उसे देखकर लगता है कि सत्ता आज संविधान से भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं।
आखिर श्री राहुल गांधी को क्या हक हैं कि वह किसी की रिहाई या बंदी बनाने के फैसले की प्रकिया में शामिल हो सकें।
फिर देखें कि कितना जनबल अन्ना के साथ आ गया। कि इन्हें अन्ना हजारे नही अन्ना करोडे कहा जाना चाहिए।
आप सभी पाठकों से मेरा अनुरोध हैं कि अपने स्थानीय सांसद, प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति के नाम अन्ना के लोकपाल बिल के संबंध में एक एक पोस्टकार्ड जरूर भेजें। एवं कम से कम 10 लोगों को पोस्टकार्ड भेजने हेतु प्रेरित करें
पोस्टकार्ड में लिखे जाने वाले ज्ञापन का मैटर निम्न रखा जा सकता हैं।
सांसद को लिखा जाने वाला पत्र
हमने आपको अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए संसद में भेजा हैं। न कि उसे बढाने के लिए। शायद ये हमारी गलती हो गई।कृप्या कर हमने आपको चुनकर जो गलती कर दी उसकी और सजा हमें ना देवें। अरे इससे अच्छी तो गुलामी थी कम से कम हमें परेशान करने वाले पराये तो थे, अब तो अपने ही हमें घाव देने लगे हैं। ये काहे की आजादी हैं। ये तो सत्ता का हस्तांतरण हैं। इसमें ज्यादा तकलीफ है क्योंकि आप हमारे हैं और आप ही हमें परेशान करें। लोकपाल बिल पारित करावें।

भवदीयः
आपके व आपकी सरकार के जुल्मों की सताई, आजादी के बाद भी आपकी गुलाम, आपकी जनता


प्रधानमंत्री को लिखा जाने वाला पत्र
हमने आपको अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए जिन्हें संसद में भेजा था शायद ये हमसे उन्हें चुनने में गलती हो गई। क्यांेकि उन्होने आपको अपना नेता चुन लिया। और इस कारण से देष का बेडा गर्क हो गया हैं। कृप्या कर हमने आपको चुनकर जो गलती कर दी उसकी और सजा हमें ना देवें। अरे इससे अच्छी तो गुलामी थी कम से कम हमें परेषान करने वाले पराये तो थे, अब तो अपने ही हमें घाव देने लगे हैं। ये काहे की आजादी हैं। ये तो सत्ता का हस्तांतरण हैं। इसमें ज्यादा तकलीफ है क्योंकि आप हमारे हैं और आप ही हमें परेशान करें। लोकपाल बिल पारित करावें। अरे सिंह साहब शर्म करो, ऐसी भी क्या मजबूरी।

भवदीयः
आपके व आपकी सरकार के जुल्मों की सताई, आजादी के बाद भी आपकी गुलाम, आपकी जनता


राष्ट्रपति को लिखा जाने वाला पत्र
आप भारत के संविधान द्वारा निर्मित सर्वोच्च पद पर आसीन हैं। हम जानते हैं कि आपका पद केवल मात्र एक रबर की मोहर के समान हैं। आपके हाथ में कुछ नही हैं। मगर आपको जो विषेषाधिकार प्राप्त हैं, उनका प्रयोग करें और इस जनता को परेषान करने वाली सरकार को सुधारें। आपसे हमें यही उम्मीद हैं। क्या आप हमारी समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रयास करके हमारी उम्मीदों पर खरी उतरेंगी या अपने पूर्व परिवार (अपनी राजनैतिक पार्टी) एवं पूर्व मित्रों (नेतागणों) के साथ रहकर अपना फर्ज अदा करेंगी। और देष को बर्बाद होते देखना पसंद करेंगी। कृप्या कर आपको चुनकर जो गलती कर दी उसकी और सजा हमें ना देवें। लोकपाल बिल पारित करावें अरे इससे अच्छी तो गुलामी थी कम से कम हमें परेषान करने वाले पराये तो थे, अब तो अपने ही हमें घाव देने लगे हैं। ये काहे की आजादी हैं। ये तो सत्ता का हस्तांतरण हैं। इसमें ज्यादा तकलीफ है क्योंकि आप हमारे हैं और आप ही हमें परेशान करें।
भवदीयः
आपके व आपकी सरकार के जुल्मों की सताई, आजादी के बाद भी आपकी गुलाम, आपकी जनता