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Thursday, November 21, 2013

"गीत गाना आ गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह "सुख का सूरज से
एक ग़ज़ल
"गीत गाना आ गया है" 
अब हमें बातें बनाना आ गया है,
पत्थरों को गीत गाना आ गया है।

हसरतें छूने लगी आकाश को,
प्यार करने का ज़माना आ गया है।

लक्ष्य था मुश्किल, पहुँच से दूर था,
साधना हमको निशाना आ गया है।

मन-सुमन वीरान उपवन थे पड़े,
पंछियों को चहचहाना आ गया है।

हाथ लेकर हाथ में जब चल पड़े,
साथ उनको भी निभाना आ गया है।

ज़िन्दग़ी के जख़्म सारे भर गये,
घोंसला हमको सजाना आ गया है।

जब चटककर रूप कलियों ने निखारा,
साज गुलशन को बजाना आ गया है।