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Thursday, August 1, 2013

"कौन राक्षस चाट रहा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
आज अपने काव्य संकलन सुख का सूरज से
एक कविता पोस्ट कर रहा हूँ!
"कौन राक्षस चाट रहा?
"
आज देश में उथल-पुथल क्यों,
क्यों हैं भारतवासी आरत?
कहाँ खो गया रामराज्य,
और गाँधी के सपनों का भारत?

आओ मिलकर आज विचारें,
कैसी यह मजबूरी है?
शान्ति वाटिका के सुमनों के,
उर में कैसी दूरी है?

क्यों भारत में बन्धु-बन्धु के,
लहू का आज बना प्यासा?
कहाँ खो गयी कर्णधार की,
मधु रस में भीगी भाषा?

कहाँ गयी सोने की चिड़िया,
भरने दूषित-दूर उड़ाने?
कौन ले गया छीन हमारे,
अधरों की मीठी मुस्काने?

किसने हरण किया गान्धी का,
कहाँ गयी इन्दिरा प्यारी?
प्रजातन्त्र की नगरी की,
क्यों  दुखिया जनता सारी?

कौन राष्ट्र का हनन कर रहा,
माता के अंग काट रहा?
भारत माँ के मधुर रक्त को,
कौन राक्षस चाट रहा?

Sunday, July 28, 2013

"लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
आज अपने काव्य संकलन सुख का सूरज से
एक गीत पोस्ट कर रहा हूँ!
"लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए"
मन-सुमन हों खिले, उर से उर हों मिले, 
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए। 
ज्ञान-गंगा बहे, शन्ति और सुख रहे- 
मुस्कराता हुआ वो वतन चाहिए।१। 
दीप आशाओं के हर कुटी में जलें, 
राम-लछमन से बालक, घरों में पलें, 
प्यार ही प्यार हो, प्रीत-मनुहार हो- 
देश में सब जगह अब अमन चाहिए। 
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए।२। 
छेनियों और हथौड़ों की झनकार हो, 
श्रम-श्रजन-स्नेह दें, ऐसे परिवार हों, 
खेत, उपवन सदा सींचती ही रहे- 
ऐसी दरिया-ए गंग-औ-जमुन चाहिए। 
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए।३। 
आदमी से न इनसानियत दूर हो, 
पुष्प, कलिका सुगन्धों से भरपूर हो, 
साज सुन्दर सजें, एकता से बजें, 
चेतना से भरे, मन-औ-तन चाहिए। 
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए।४।

Tuesday, July 23, 2013

"प्यार का राग-ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
आज अपने काव्य संकलन सुख का सूरज से
एक गीत पोस्ट कर रहा हूँ!
"ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए"

मोक्ष के लक्ष को मापने के लिए,
जाने कितने जनम और मरण चाहिए।
प्रीत की पोथियाँ बाँचने के लिए-
ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए।।

लैला-मजनूँ को गुजरे जमाना हुआ,
किस्सा-ए हीर-रांझा पुराना हुआ,
प्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।
प्रीत की पोथियाँ बाँचने के लिए-
ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए।।

सन्त का पन्थ होता नही है सरल,
पान करती सदा मीराबाई गरल,
कृष्ण और राम को जानने के लिए-
सूर-तुलसी सा ही आचरण चाहिए।
प्रीत की पोथियाँ बाँचने के लिए-
ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए।।

सच्चा प्रेमी वही जिसको लागी लगन,
अपनी परवाज में हो गया जो मगन,
कण्टकाकीर्ण पथ नापने के लिए-
शूल पर चलने वाले चरण चाहिए।।
प्रीत की पोथियाँ बाँचने के लिए-
ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए।।

झर गये पात हों जिनके मधुमास में,
लुटगये हो वसन जिनके विश्वास में,
स्वप्न आशा भरे देखने के लिए-
नयन में नींद का आवरण चाहिए।
प्रीत की पोथियाँ बाँचने के लिए-
ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए।।

Friday, July 19, 2013

"माँ बस इतना उपकार करो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मित्रों!
आज अपने काव्य-संकलन
से माँ वीणापाणि की वन्दना के रूप में
पहली रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
 --
तुम बिन सूना मेरा आँगन,
बाट जोहता द्वार।
उर में करो निवास शारदे,
मन के हरो विकार।।
 
मेरा वन्दन स्वीकार करो।
माँ बस इतना उपकार करो।।

मुझमें कोई विज्ञान नही,
कविता का कुछ भी ज्ञान नही,
अपनी त्रुटियों का भान नही,
मानस में मधुर विचार भरो।
माँ बस इतना उपकार करो।।

मुझमें भाषा चातुर्य नही,
शब्दों का भी प्राचुर्य नही,
वाणी में भी माधुर्य नही,
छन्दों को तुम साकार करो।
माँ बस इतना उपकार करो।।

तुलसी जैसी है भक्ति नही,
मीरा सी है आसक्ति नही,
मुझमें कोई अभिव्यक्ति नही,
छल-छद्म-प्रपंच विकार हरो।
माँ बस इतना उपकार करो।।

Tuesday, July 16, 2013

"मेरा काव्य संग्रह सुख का सूरज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
        जनवरी 2011 में मेरी दो पुस्तकों  "सुख का सूरज" और "नन्हे सुमन"  का विमोचन उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमन्त्री  मा. रमेश पोखरियाल निशंक जी ने किया था। आज से इस ब्लॉग पर "सुख का सूरज" पुस्तक से क्रमशः रचनाएँ प्रकाशित करता रहूँगा।
      "सुख का सूरज" पुस्तक की भूमिका डॉ. सिद्धेश्वर सिंह- हिन्दी  विभागाध्यक्ष, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय़, खटीमा (उत्तराखण्ड) ने लिखी थी।  डॉ. सिद्धेश्वर सिंह हिन्दी साहित्य और ब्लॉग की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम है। जब कभी विद्वता की बात चलती है तो डॉ. सिद्धेश्वर सिंह को कभी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। कर्मनाशा ब्लॉग पर इनकी लेखनी के विविध रूपों की झलक हमको मिलती है। हिन्दी का प्रोफेसर होने के साथ-साथ इनकी अंग्रेजी पर भी समानरूप से पकड़ है। विदेशी भाषा के साहित्यकारों की रचनाओं के इन्होंने बहुत ही कुशलता से दर्जनों अनुवाद किये हैं।
          डॉ. सिद्धेश्वर सिंह लिखते हैं-"यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे इनका सानिध्य अक्सर मिलता रहता है। मेरी पुस्तक 'सुख का सूरज' की भूमिका लिखकर इन्होंने मुझे कृतार्थ किया है। जिसके लिए मैं इनका आभारी हूँ। आपके साथ मैं इस पुस्तक की भूमिका को साझा करते हुए बहुत हर्ष हो रहा है!"
कविता के सुख का सूरज
शब्द कोई व्यापार नहीं है।
तलवारों की धार नहीं है।

"कविता के सुख का सूरज" (डॉ. सिद्धेश्वर सिंह)


 भूमिका

      आज, ऐसे समय में जब हमारे निकट की दुनिया में विद्यमान लगभग प्रत्येक विचार व वस्तु को उपादेयता की कसौटी पर कस कर देखे जाने का चलन आम होता जा रहा है और तात्कालिकता को एक मूल्य की तरह बरते जाने में कोई संकोच नहीं रह गया है व  कविता के लिखने-पढ़ने-सुनने-गुनने वालों के सीमित संसार में शब्द की अर्थवत्ता को लेकर बहुत गंभीरता से सोचा जाना कोई जरूरी सवाल नहीं दीखता हो वहाँ यदि कहीं  कुछ भला, सुन्दर तथा सदाशयता से पूरित अथवा उसकी ऐषणा करता हुआ-सा मिल जाता है तो इस बात पर यकीन पुख्ता होता है कि सोच एवं सृजन की सदानीरा का उद्गम जिन पहाड़ों के पार है वहाँ का हिमनद तमाम तरह की प्रतिकूलताओं के बावजूद विलोपित नहीं होगा अपितु सूरज की ऊष्मा से ऊर्जा ग्रहण कर अनंत काल तक बूँद-बूँद रिसता हुआ  स्वच्छ-जीवनदायी जल में रूपायित होता रहेगा।
आज प्रायः देखने को मिल जाता है कि हिन्दी कविता में शब्दों के करघे पर बहुत महीन कताई हो रही है। आजकल कभी-कभार तो ऐसा भी दिखाई दे जाता है कि कताई-बुनाई के अतिशय मोह में संवेदनाओं के सहज तंतु कहीं अदृश्य से हो गए हैं ऐसे में सहज ही उन कविताओं की स्मृति होने लगती है जिनके सानिध्य में हम सब का बालपन बीता है। आखिर ऐसी कौन सी बात रही है उन कविताओं में कि समय की शिल्प पर अंकित उनकी छाप अमिट है? इस प्रश्न के उत्तर में दो बातें समझ में आती हैं। पहली तो यह कि उनमें व्यक्त सहजता का सरल प्रस्तुतिकरण और दूसरी उनकी गेयता-लयात्मकता। ये दोनो चीजें कविता को एक प्रस्तुति-कला में ढाल देने के लिए सहज हैं और संप्रेषणीयता की संवाहिका भी। ‘सुख का सूरज’ संग्रह की कविताओं में निहित भाव व विचार की सहजता तथा लयात्मक संप्रेषणीयता का समन्वय इसे आज के हिन्दी कविता-संसार में अपनी-सी भाषा में कही जाने वाली अपनी-सी बात के रूप में कविता प्रेमियों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है।
          ‘सुख का सूरज’ में संकलित कविताओं की  विविधवर्णी छवियाँ हैं। इनमें जहाँ एक ओर वंदना-आराधना, अनुनय-विनय, राग-अनुराग, मान-मनुहार और प्रकृति-परिवेश की कोमल काया वाली कवितायें हैं वहीं दूसरी ओर कवि ‘मयंक’देश -दुनिया में व्याप्त मोह-व्यामोह से उपजी स्वार्थपरता व शुभ, शुचि, सुंदर के प्रति तिरोहित होते मान-सम्मान से उपजी खिन्नता व आक्रोश को वाणी देते हुए एक सुन्दर तथा बेहतर दुनिया की तलाश की छटपटाहट में रत दिखाई देते हैं।

आज भी लोगों को पावस लग रही है।
चाँदनी फिर क्यों अमावस लग रही है?

          कवि ‘मयंक’ की कविताओं में एक चीज जो सबसे अधिक आकर्षित करने वाली है वह है निराशा का अभाव। कविता में प्रायः ऐसा होता देखा जाता है कि प्रेम अंततः पीड़ा में परिवर्तित हो जाता है और आक्रोश नैराश्य की शरण में पलायन कर अपना एक ऐसा संसार रच लेता है जो इसी दुनिया में होता हुआ भी इसी दुनिया से दूरी बनाने को अपना ध्येय मान लेता है लेकिन ‘सुख का सूरज’ की कविताओं में पीड़ा में ही प्रियतम की तलाश का आभास नहीं है अपितु इन कविताओं में इसी दुनिया में निवास करने वाले मनुष्य देहधरी दो प्राणियों के अंतस में अवस्थित अनुराग को स्वर देने की सहजता है और प्रतिकूलताओं-प्रपंचों की निन्दा-आलोचना से आगे बढ़कर एक नये सुखमय,  सौहार्द्रपूर्ण संसार की रचना के प्रति विश्वास व क्रियाशीलता का स्पष्ट आग्रह दिखाई देता है।

लक्ष्य है मुश्किल बहुत ही दूर है।
साधना मुझको निशाना आ गया है।

हाथ लेकर हाथ में जब चल पड़े ,
साथ उनको भी निभाना आ गया है।

          डॉ.. रूपचंद्र शास्त्री ‘मयंक’  एक सहज, सरल, सहृदय व्यक्ति हैं। उनके पास राजनीतिक-सामाजिक जीवन का सुदीर्घ अनुभव है। जीवन व जगत वैविध्यता को उन्होंने खूब देखा-परखा है।  एक साहित्यकार और ब्लॉगर के रूप में भी वे सबके सुपरिचित हैं। यह उनकी उदारता व स्नेह ही है कि मुझे इस संग्रह की पांडुलिपि को पढ़ने का सुख  मिला है तथा  ‘दो शब्द’ लिखने का सौभाग्य। ‘सुख का सूरज’  उनकी चुनिंदा कविताओं का ऐसा संग्रह है जो द्रुत गति से भाग रहे कुहरीले दिवस के क्षितिज पर सूरज की तरह उदित होकर साहित्य प्रेमियों को सुख देगा और रचना की रात्रि के पटल पर उनके उपनाम मयंक की सार्थकता को सिद्ध करेगा और अंत में स्वयं कवि के ही शब्दों में बस यही कहना है- 

पथ आलोकित है, आगे को बढ़ते जाओ।
उत्कर्षों के उच्च शिखर पर चढ़ते  जाओ।

-         सिद्धेश्वर सिंह
21नवंबर, 2010

Sunday, March 24, 2013

"नाच मेरी बुलबुल" की पहली सेमी फ़ाईनलिस्ट सुश्री रूपा बाई

"नाच मेरी बुलबुल" की पहली सेमी फ़ाईनलिस्ट सुश्री रूपा बाई
दोस्तो, ताऊ टीवी के होली कार्यक्रम "नाच मेरी बुलबुल" प्रतियोगिता मे अब प्राथमिक दौर के कुछ ही प्रतियोगियों का परफ़ार्मेंस बाकी बचा है. प्रतियोगियों को विश्वास दिलाया जाता है कि सभी को मौका दिया जायेगा, कृपया थोडा धैर्य रखें....आपकी रचनाएं हमारे पास सुरक्षित हैं....

अभी तक जो प्रतियोगी भाग ले चुके हैं उनमें से आपके वोटॊं के आधार पर रिजल्ट का काम शुरू हो चुका है...आपके वोटॊं की गिनती के आधार पर हमारी पहली सेमी फ़ाईनलिस्ट चुनी गई हैं...
.सुश्री रूपा बाई....हार्दिक बधाईयां....बधाईयां ही बधाईयां..


पिछले राऊंड में सुश्री रूपा बाई ने "कलेजा फ़ोड-कमर तोड"  नृत्य प्रस्तुत किया था जिसकी वजह से वो आपके वोटों की वजह से  सेमीफ़ाईनल में अपनी जगह बना पाई....आज ये सबसे पहले अपना गीत सुनायेंगी उसके बाद आज अपनी फ़ाईनल   डांस  प्रस्तुति देंगी.

आईये सुश्री रूपा बाई.............आकर अपना सेमीफ़ाईनल मुकाबले के लिये परफ़ार्मेंस दिजिये.......
नाच मेरी बुलबुल की पहली सेमीफ़ाईनलिस्ट सुश्री रूपा बाई


ताऊ टीवी के प्यारे दर्शकों मैं आपका आदाब बजा लाती हूं....आपकी बहुत शुक्र गुजार हूं कि आपने मुझे अधिक से अधिक वोट देकर नाच मेरी बुलबुल के  सेमीफ़ाईनल में पहुंचाया. आपसे मैं अपील करना चाहुंगी की मेरा आज का प्रदर्शन देखकर मुझे अधिक से अधिक वोट करें और फ़ाईनल जीतने का मौका दें

पहले मैं अपनी रचना आपके सम्मुख प्रस्तुत करती हूं.....उसके बाद मेरा प्रसिद्ध "मटका फ़ोड -कमर मत तोड"  डांस पेश करूंगी... पेशे नजर है आज का होली गीत.....आपके  ज्यादा से ज्यादा वोट चाहुंगी....


लेके हाथों में गुलाल,
ताऊ ने पकड़ी टेढ़ी चाल।
ताऊ का क्या कहना।
गोरियों बच के रहना।।

पीकर लोटा भरके भंग,
मचाता होली का हुड़दंग,
नाचता घुमा-घुमाकर अंग,
पहन कर दामन-चोली लाल।
ताऊ का क्या कहना।
गोरियों बच के रहना।।

ताई ने देखा जब ये रंग,
रह गयी बेचारी वो दंग,
बँधी क्यों मैं बन्दर के संग,
मचाता है ये बहुत धमाल।
ताऊ का क्या कहना।
गोरियों बच के रहना।।

पकड़कर लाई ताई कान,
हुआ तब ताऊ भी हलकान,
मिला दी मिट्टी में सब शान,
किया ताऊ का भंग धमाल।
ताऊ का क्या कहना।
गोरियों बच के रहना।।

किया कमरे में अब तो बन्द,
कहा अब ले मस्ती-आनन्द,
अकेले मचा यहीं पर द्वन्द,
उधेड़ी बेलन लेकर खाल।
ताऊ का क्या कहना।
गोरियों बच के रहना।।

ताई की ज्यों-ज्यों पड़ती मार,
मचाये ताऊ हा-हाकार,
माफ करदो सजनी इस बार,
मचाऊँगा अब नहीं बबाल।
ताऊ का क्या कहना।
गोरियों बच के रहना।।

तभी हो गयी सुहानी भोर,
निहारा हमने चारों ओर,
स्वप्न ने दिया हमें झकझोर,
नहीं था कुछ भी तो विकराल।
ताऊ का क्या कहना।
गोरियों बच के रहना।।

इसी के साथ आपको होली की शुभकामनाएं देता हुआ विदा चाहुंगा.....

                                                                ♥ डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ♥


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साथियों...अब देखिये सुश्री रूपा कुमारी का फ़ाईनल परफ़ार्मेंस....जिसमे वो दिखा रही हैं..अपना प्रसिद्ध "मटका फ़ोड -कमर मत तोड".....  डांस.... दिल खोल कर वोट किजियेगा...आईये ....सुश्री रूपा बाई.....

सेमीफ़ाईनल में "मटका फ़ोड -कमर मत तोड" डांस प्रस्तुत करते हुये सुश्री रूपा बाई

ब्रेक...ब्रेक...ब्रेक...ब्रेक....ब्रेक....ब्रेक...ब्रेक...ब्रेक...ब्रेक....ब्रेक....ब्रेक...ब्रेक...ब्रेक...ब्रेक....ब्रेक....ब्रेक...ब्रेक...ब्रेक...ब्रेक....ब्रेक....ब्रेक...ब्रेक...ब्रेक...ब्रेक....

ये था नाच मेरी बुलबुल प्रतियोगिता का पहला सेमी फ़ाईनल.....कुछ प्राथमिक दौर के प्रतिभागी बाकी बचे हैं....और जल्दी ही आपको  बतायेंगे...बाकी के तीन सेमीफ़ाईनलिस्ट जौन हैं? इंतजार करते रहिये.....

Thursday, January 3, 2013

पुस्तक समीक्षा-“देवम बाल उपन्यास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सीख का संगम है देवम बाल उपन्यास
      लगभग दो माह पूर्व मुझे “देवम बाल उपन्यास” की प्रति डाक से उपन्यासकार आनन्द विश्वास ने भेजी थी। लेकिन अपनी अपरिहार्य व्यस्तता के कारण इसके बारे में कुछ भी नहीं लिख पाया। पिछले तीन दिनों से मैं इस बाल सुलभ कृति को पढ़ता रहा और आज थोड़ा समय निकालकर कुछ शब्द लिखने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
       साहित्यकार मुझे समय-समय. पर अपनी कृतियाँ भेंट करते रहे हैं। उन पर कलम भी चलाता रहा हूँ मगर देवम बाल उपन्यास को पढ़कर मुझे प्रसन्नता के साथ-साथ यह अनुभूति भी हुई है कि यदि साहित्यकार चाहे तो समाज को बदल सकता है। खास तौर से बच्चों को क्योंकि वे ही हमारी भावी विरासत हैं।
     उपन्यासकार आनन्द विश्वास ने छोटी-छोटी घटनाओं को बालक देवम के माध्यम से एक बाल उपन्यास का रूप दिया है। जिनसे न केवल बच्चों को अपितु बड़ों को भी शिक्षा मिलती है।
     इस कृति में माला के रूप में 13 जीवनोपयोगी घटनाओं के साथ 14वीं कड़ी के रूप में लेखक ने एक कविता का भी मनका पिरोया है-“बुरा न बोलो बोल रे...”
     यह तो मैं नहीं जानता कि इस उपन्यास के नायक “देवम” से लेखक का क्या रिश्ता-नाता है, मगर इतना जरूर है कि इसका नायक “देवम” एक आदर्श नायक है।
     कृति की प्रस्तावना में लेखक ने लिखा है-
“माँ, बालक की प्रथम गुरू होती है। संस्कारबालक को माँ से ही प्राप्त होते हैं। अच्छे संस्कार ही तो बालक के चरित्र निर्माण के आधार स्तम्भ होते हैं।“
उपन्यासकार ने इस उपन्यास की शुरूआत की है-“देवम बगीचे में”। जिसमें बगीचे को परिवार का अंग बताया गया है। जिस प्रकार परिवार के सभी सदस्यों के साथ व्यवहार किया जाता है उसी प्रकार का व्यवहार देवम भी अपने बगीचे के साथ करता है।
“... अच्छी संस्कृति ही अच्छे संस्कारों की आधारशिला होती है।
रातरानी, मोगरा और लिली से हाय-हैल्लो कर, जैसे ही वह छुईमुई की ओर आगे बढ़ता, वैसे ही वह मुर्झाने लगती।
तो वह कहता, अरे भाई, तुम मुझसे क्यों डरते हो? मुझसे डरने की जरूरत नहीं है। मैं तो तुम्हारा दोस्त ही हूँ तो फिर डरना कैसा?...”
      बगीचे के सभी बिरुओं से नायक शुभम का मित्र के रूप में व्यवहार करना और उनको खिलखिलाते हुए देखने का भाव यह सन्देश देता है कि परिवार में मित्रता का भाव विद्यमान रहना चाहिए।
     उपन्यास में दूसरी घटना को “श्री क्षय पारो” के नाम से समाविष्ट किया गया है। जिसमें देवम और उसके साथी मैदान में क्रिकेट खेल रहे हैं। देवम ने बॉल पर जोर का शॉट मारा तो गेंद मैदान की दीवार के पार चली गयी। जहाँ पर झोंपड़ी में पलने वाले निर्धन बालकों की नजर जब बॉल पर पड़ी तो एक आठ साल के बच्चे रजत ने अपनी बहन से कहा कि पारो देख कितनी सुन्दर गेंद है। देवम के साथी कहते रहे कि हमारी गेंद वापिस करो मगर शुभम ने खुशी-खुशी वह गॆंद पारो को दे दी और अपने मम्मी-पापा से कह कर ऐसे बालकों को विद्यालय में भी दाखिला दिलाया। अर्थात् समाज में सम्वेदना का भाव जाग्रत करने की सीख यह कड़ी देती है।
     तीसरी कड़ी में चाचा नेहरू के जन्मदिवस पर “फूल नहीं तोड़ेंगे हम” सन्देश देते हुए कुछ आख्यानकों को प्रस्तुत किया गया है।
“देवम अपने आप को नहीं समझा पा रहा था। वह सोच रहा था कि मम्मी कहतीं हैं कि हमें फूल नहीं तोड़ना चाहिए। पापा कहते हैं- हमें फूल नहीं तोड़ना चाहिए। मैडम कहतीं हैं- हमें फूल नहीं तोड़ना चाहिए। और मेरा मन भी कहता है-हमें फूल नहीं तोड़ना चाहिए।
तो फिर चाचा नेहरू हर रोज गुलाब का एक फूल तोड़कर अपने कोट पर क्यों लगाते थे?
क्यों हर रोज गुलाब और अन्य फूलों की अनगिन मालाएं मन्दिर, मस्जिद और गुरूद्वारों में चढ़ाई जाती हैं? क्या ये फूलों की बलि नहीं है?....”
      समाज में आये दिन धरना-प्रदर्शन होता रहता है जिसमें सरकारी सम्पत्ति के सात-सात जन हानि भी हो जाती हैं। इसी पर देवम के माध्यम से लेखक ने अभिनव सन्देश देने का प्रयास किया है-
“...एक छोटी सी नादानी-नासमझी कितना बड़ा अहित कर सकती है, कितने लोगों को कष्ट पहुँचा सकती है....।“
         “स्कूल पिकनिक” के बहाने शुभम के माध्यम से लेखक ने सन्देश दिया है कि किस प्रकार शुभम ने अपनी सहपाठिनी के जीवन को बचाने में सफल रहा है -
“इधर पायल पानी में डूबने लगी। सहेलियों ने जोर-जोर से बचाओ..बचाओ...चिल्लाना शुरू किया।
तभी देवम का ध्यान डूबती पायल की ओर गया। उसने तुरन्त ही गजल और शीला का दुपट्टा लेकर उनको आपस में बाँधकर.....। इस बार पायल ने दुपट्टे को पकड़ लिया...।“
      अगली कड़ी में उपन्यासकार ने “चिड़िया फुर्र...” शीर्षक से यह बताने की कोशिश की है कि माता पिता कितने प्यार से सन्तान को पालते हैं लेकिन उनके पर निकलते ही वह सारे रिश्ते नाते तोड़कर फुर्र हो जाते हैं।
उपन्यासकार आनन्द विश्वास ने वाणी पर संयम, बर्थ-डे गिफ्ट, वाद-विवाद प्रतियोगिता, बहादुर देवम, देवम की चतुराई, अक्षर-ज्ञान गंगा, आई हेट यू पापा जैसे शीर्षकों से बालकों और समाज को शिक्षा देने का प्रयास किया है।
अन्त में इतना जरूर कहना चाहूँगा कि इस बाल उपन्यास में रोचकता और जिज्ञासा अन्त तक बनी रही है। जो कि उपन्यास की पहली विशेषता होती है।
        “देवम” बाल उपन्यास को डायमंड पाकेट बुक्स (प्रा.) लि. नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है। जिसका कॉपीराइट लेखकाधीन है। पेपरबैक वाले इस उपन्यास में 128 पृष्ठ हैं और इसका मूल्य मात्र 100/- रुपये है। उपन्यास की विशेषता यह है कि इसमें कहीं पर भी अनावश्यकरूप से खाली स्थान छोड़कर पृष्ठों की बर्बादी नही की गई है।
       “देवम” बाल उपन्यास को सांगोपांग पढ़कर मैंने अनुभव किया है कि इसमें सीधा और सरल भाषिक सौन्दर्य है। जो पाठकों के हृदय पर सीधा असर करता है।
     मुझे पूरा विश्वास है कि “देवम बाल उपन्यास” से न केवल बालक अपितु सभी वर्गों के पाठक भी लाभान्वित होंगे और प्रस्तुत कृति समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगी।
     यह कृति आनन्द विश्वास, न्यू अशोक नगर, मैट्रो स्टेशन के पास, मयूर विहार, फेस-1 (एक्सटेंशन), नई दिल्ली-110 096, मोबाइल-09898529244 से प्राप्त की जा सकती है। यह पुस्तक Dimond Books, FlipKart, HomeShop 18, IndiaTimes, BookAdda, IndiaPlaza, InfiBeam, URead, NBC India पर भी विक्रय के लिये उपलब्ध है।
समीक्षक
 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार 
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail .  roopchandrashastri@gmail.com
फोन-(05943) 250129
मोबाइल-09368499921