मित्रों!
अपने काव्य संकलन सुख का सूरज से ![]()
एक गीत
"अमृत भी पा सकता हूँ"
अपना माना है जब तुमको,
चाँद-सितारे ला सकता हूँ । तीखी-फीकी, जली-भुनी सी, सब्जी भी खा सकता हूँ। दर्शन करके चन्द्र-वदन का, निकल पड़ा हूँ राहों पर, बिना इस्तरी के कपड़ों में, दफ्तर भी जा सकता हूँ। गीत और संगीत बेसुरा, साज अनर्गल लगते है, होली वाली हँसी-ठिठोली, मैं अब भी गा सकता हूँ। माता-पिता तुम्हारे मुझको, अपने जैसे लगते है, प्रिये तम्हारी खातिर उनको, घर भी ला सकता हूँ। जीवन-जन्म दुखी था मेरा, बिना तुम्हारे सजनी जी, यदि तुम साथ निभाओ तो, मैं अमृत भी पा सकता हूँ। |
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Thursday, September 5, 2013
"अमृत भी पा सकता हूँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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