मेरे काव्यसंग्रह "सुख का सूरज" से
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एक गीत
"सुहाना लगता है"
सबको अपना आज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
उडने को आकाश पड़ा है,
पुष्पक भी तो पास खड़ा है,
पंछी को परवाज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
राजनीति की सनक चढी है,
लोलुपता की ललक बढ़ी है,
काँटों का भी ताज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
गेहूँ पर आ गई बालियाँ,
हरे रंग में रंगी डालियाँ,
ऋतुओं में ऋतुराज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
गुञ्जन करना और इठलाना,
भीना-भीना राग सुनाना,
मलयानिल का साज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
तन-मन ने ली है अँगड़ाई,
कञ्चन सी काया गदराई,
होली का आगाज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
टेसू दहका अंगारा सा,
आशिक बहका आवारा सा,
बासन्ती अन्दाज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
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Wednesday, December 18, 2013
"सुहाना लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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