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Friday, February 21, 2014

"उम्र तमाम हुई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "सुख का सूरज" से 
   
गीत
"...उम्र तमाम हुई" 
अपनों की रखवाली करते-करते उम्र तमाम हुई।
पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।। 

सुख आये थे संग में रहने. 

डाँट-डपट कर भगा दिया, 

जाने अनजाने में हमने, 

घर में ताला लगा लिया, 

पवन-बसन्ती दरवाजों में, आने में नाकाम हुई। 

पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।। 

मन के सुमन चहकने में है, 

अभी बहुत है देर पड़ी, 

गुलशन महकाने को कलियाँ, 

कोसों-मीलों दूर खड़ीं, 

हठधर्मी के कारण सारी आशाएँ हलकान हुई। 

पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।। 

चाल-ढाल है वही पुरानी, 

हम तो उसी हाल में हैं, 

जैसे गये साल में थे, 

वैसे ही नये साल में हैं, 

गुमनामी के अंधियारों में, खुशहाली परवान हुई।

पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।

6 comments:

  1. बढ़िया प्रस्तुति -
    आभार गुरु जी-

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 22/02/2014 को "दुआओं का असर होता है" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1531 पर.

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  3. sacchi bat .....kaise samay bit jata hai pata hi nahi chalta ....

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  4. गुमनामी के अंधियारों में, खुशहाली परवान हुई।
    - खुशहाली को ढूँढने के लिए कौन निकले ,सब अपने-अपने में सिमटे रह गए हैं !

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  5. jeevan ka katu satya sunder dhang se prastut kiya aapne

    shubhkamnayen

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