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Friday, November 8, 2013

"सवेरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह "सुख का सूरज" से
एक गीत

"
सवेरा"
दिन चार चाँदनी के,
फिर छायेगा अन्धेरा।
दो दिन की जिन्दगी में,
क्या पायेगा सवेरा।।

जीवन के इस सफर में,
मरुथल उजाड़ होंगे,
खाई-कुएँ भी होंगे,
ऊँचे पहाड़ होंगे,
चलना ही जिन्दगी है,
करना नही बसेरा।।

करना न कामनाएँ,
सपने नही सजाना,
आया है जो जगत में,
उसको पड़ा है जाना,
दुनिया है धर्मशाला,
कुछ भी नही है तेरा।।

पाया अगर है जीवन,
निष्काम बनके जीना,
सुख-दुख, सरल-गरल को,
चुप-चाप होके पीना,
काजल की कोठरी में,
उजला ही रखना डेरा।।

दिन चार चाँदनी के,
फिर छायेगा अन्धेरा।
दो दिन की जिन्दगी में,
क्या पायेगा सवेरा।।

11 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (09-11-2013) "गंगे" चर्चामंच : चर्चा अंक - 1424” पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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  3. Nice computer and internet ke nayi jankaari tips and trick ke liye dhekhe www.hinditechtrick.blogspot.com

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  4. उत्कृष्ट भावों से सजी बहुत सुंदर प्रस्तुति !

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  5. पाया अगर है जीवन,
    निष्काम बनके जीना,
    सुख-दुख, सरल-गरल को,
    चुप-चाप होके पीना,
    काजल की कोठरी में,
    उजला ही रखना डेरा।।

    दिन चार चाँदनी के,
    फिर छायेगा अन्धेरा।
    दो दिन की जिन्दगी में,
    क्या पायेगा सवेरा।।
    जीवन दर्शन सार, दिया है

    इतना कुछ उपकार किया है।

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  6. सुन्दर भावों का संचार करती प्रस्तुति

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  7. बहुत सुन्दर और सारगर्भित रचना...

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  8. वाह ...लयबद्ध रचना पढ़ने का आनन्द ही कुछ और होता है ...शुक्रिया

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