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Thursday, April 10, 2014

"शब्द कोई व्यापार नही है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अपने काव्य संकलन सुख का सूरज से
गीत
"शब्द कोई व्यापार नही है"  
जीवन की अभिव्यक्ति यही है,
क्या शायर की भक्ति यही है?

शब्द कोई व्यापार नही है,
तलवारों की धार नही है,
राजनीति परिवार नही है,
भाई-भाई में प्यार नही है,
क्या दुनिया की शक्ति यही है?

निर्धन-निर्धन होता जाता,
अपना आपा खोता जाता,
नैतिकता परवान चढ़ाकर,
बन बैठा धनवान विधाता,
क्या जग की अनुरक्ति यही है?

छल-प्रपंच को करता जाता,
अपनी झोली भरता जाता,
झूठे आँसू आखों में भर-
मानवता को हरता जाता,
हाँ कलियुग का व्यक्ति यही है?

5 comments:


  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11.04.2014) को "शब्द कोई व्यापार नही है" (चर्चा अंक-1579)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. मौज़ू रवानी लिए है यह भावपूर्ण व्यंग्य रचना :

    शब्द कोई व्यापार नही है,
    तलवारों की धार नही है,
    राजनीति परिवार नही है,
    भाई-भाई में प्यार नही है,
    क्या दुनिया की शक्ति यही है?

    ReplyDelete
  3. कुछ नया करने का सशक्त आवाहन करती है यह रचना :

    अनुबन्धों में भी मक्कारी,
    सम्बन्ध बन गये व्यापारी।
    जननायक करते गद्दारी,
    लाचारी में दुनिया सारी।
    अब नहीं समय शीतलता का,
    मलयानिल में अंगार भरो।
    सोई चेतना जगाने को,
    जनमानस में हुंकार भरो।।

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