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Friday, September 13, 2013

"प्रीत का मौसम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
अपने काव्य संकलन सुख का सूरज से
एक ग़ज़ल
"प्रीत का मौसम"
दिल हमारा अब दिवाना हो गया है।
फिर शुरू मिलना-मिलाना हो गया है।।

हाथ लेकर चल  पड़े हम साथ में,
प्रीत का मौसमसुहाना हो गया है।

इक नशा साजिन्दगी में छा गया,
दर्द-औ-गमअपना पुराना हो गया है।

सब अधूरे् स्वप्न पूरे हो गये,
मीत सब अपनाजमाना हो गया है।

दिल के गुलशन में बहारें छा गयीं,
अब चमनअपना ठिकाना हो गया है।

तार मन-वीणा केझंकृत हो गये,
सुर में सम्भव गीत गाना हो गया है।

मन-सुमन का रूप अब खिलने लगा,
बन्द अब, आँसू बहाना हो गया है।

2 comments:

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