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Thursday, September 26, 2013

"बरबाद कर डाला" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
अपने काव्य संकलन सुख का सूरज से

एक गीत
--
"बरबाद कर डाला"
गुलों की चाह में,
अपना चमन बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

चहकती थीं कभी,
गुलशन की छोटी-छोटी कलियाँ जब,
महकती थी कभी,
उपवन की छोटी-छोटी गलियाँ जब,
गगन की छाँह में,
शीतल पवन बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

चमकती थी कभी बिजली,
मिरे काँधे पे झुक जाते,
झनकती थी कभी पायल,
तुम्हारे पाँव रुक जाते,
ठिठुर कर डाह में,
अपना सुमन बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

सिसकते हैं अकेले अब,
तुम्ही को याद कर-कर के,
बिलखते हैं अकेले अब,
फकत फरयाद कर-कर के,
अलम की बाँह में,
अपना जनम बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

6 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति -
    आभार आदरणीय-

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    ReplyDelete
  3. सुन्दर कविता

    ReplyDelete

  4. सिसकते हैं अकेले अब,
    तुम्ही को याद कर-कर के,
    बिलखते हैं अकेले अब,
    फकत फरयाद कर-कर के,
    अलम की बाँह में,
    अपना जनम बरबाद कर डाला।
    वफा की राह में,
    चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

    वाह निकल गया मुंह से ,

    ReplyDelete
  5. सिसकते हैं अकेले अब,
    तुम्ही को याद कर-कर के,
    बिलखते हैं अकेले अब,
    फकत फरयाद कर-कर के,
    अलम की बाँह में,
    अपना जनम बरबाद कर डाला।
    वफा की राह में,
    चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

    वाह निकल गया मुंह से ,

    कलेजा चाक कर डाला।

    ReplyDelete

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