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Saturday, January 18, 2014

"उदगार ढो रहे हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "सुख का सूरज" से 
   
एक गीत

ऊसर जमीन में हम, उपहार बो रहे हैं।

हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।

बन कर सजग सिपाही, हम दे रहे हैं पहरे,
हम मेट देंगे अपने, पर्वत के दाग गहरे,
उनको जगा रहे हैं, जो हार सो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।

तूफान आँधियों में, हमने दिये जलाये,
फानूस बन गये हम, जब दीप झिलमिलाये,
हम प्रीत के सुजल से, अंगार धो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।

मनके सभी पिरोये, टूटे सुजन मिलाये,
वीरान वाटिका में, रूठे सुमन खिलाये,
माला के तार में हम, अब प्यार पो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।

3 comments:

  1. achchha geet ....magar udgar ' dhone ' shabd se bojh jasi abhivyakti ho rahi hai ...jabki ye to garima ki baat hai ...

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  2. क्या बात है आदरणीय-
    शुभकामनायें-

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  3. बहुत सुन्दर ....

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