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Tuesday, October 8, 2013

"छा गये बादल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
अपने काव्य संकलन सुख का सूरज से

एक गीत
गीत मेरा
स्वर श्रीमती अमर भारती जी का
"छा गये बादल"
बड़ी हसरत दिलों में थी, गगन में छा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।
गरज के साथ आयें हैं, बरस कर आज जायेंगे,
सुहानी चल रही पुरवा, सभी को भा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।
धरा में जो दरारें थी, मिटी बारिश की बून्दों से,
किसानों के मुखौटो पर, खुशी चमका गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।
पवन में मस्त होकर, धान लहराते फुहारों में,
पहाड़ों से उतर कर, मेह को बरसा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

4 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. सुन्दर सांगीतिक रचना सूर्य स्तुति :

    पवन में मस्त होकर, धान लहराते फुहारों में,
    पहाड़ों से उतर कर, मेह को बरसा गये बादल।

    स्वर भी बंदिश की माधुर्य लिए हैं निर्दोष उच्चारण लिए हुए हैं।

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  3. वृष्टिकर्ता, सृष्टिकर्ता और सृष्टिहर्ता बादलों के प्रति उत्तम सम्मान गीत के लिए शास्त्री जी आभार।
    किन्तु ..
    पहाड़ों में जो बरसे थे, आज से कुछ माह पहले
    प्रलय सी बाढ़ लाये थे, महा बेकार वे बादल ॥

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